इस्लामी अक़ीदा कोई सैद्धांतिक और दार्शनिक पद्धति नहीं है; बल्कि यह एक गंभीर व्यावहारिक पद्धति है। अतः अमल (कर्म) इस अक़ीदा का एक मूल तत्व है। इसलिए अहले सुन्नत इस बात पर एकमत हैं कि ईमान "कौल और अमल" (कथनी और करनी) का नाम है — यानी जुबान से कहना, दिल से मानना और अंगों से उसपर अमल करना। सही अक़ीदा सीखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे उसके जानकार और उस पर अमल करने वालों से सीधा सीखा जाए। जो लोग ऐसा करने में सक्षम हैं, उनके लिए यह सबसे सुरक्षित और सबसे लाभदायक तरीक़ा है। और जिनके पास यह सुविधा नहीं है, वे भरोसेमंद किताबों और विद्वानों के व्याख्यानों से सीख सकते हैं। अक़ीदा पर उपयोगी पुस्तकों के लिए विस्तृत उत्तर देखें।
इस्लामी अक़ीदा एक गंभीर व्यावहारिक पद्धति है, और अक़ीदा पर महत्वपूर्ण पुस्तकें
प्रश्न: 59911
क्या इस्लामी अक़ीदा एक सैद्धांतिक पद्धति है या एक गंभीर व्यावहारिक पद्धित? अक़ीदा सीखने के लिए कौन-कौन सी महत्वपूर्ण किताबें हैं? वर्तमान समय में अक़ीदा को कैसे लागू किया जा सकता है? अक़ीदा सीखने के क्या तरीके हैं? अगर कोई व्यक्ति इस्लाम के कुछ कार्य करता है और कुछ छोड़ देता है (जैसे नमाज़ पढ़ता है लेकिन ज़कात नहीं देता, या नज़र नहीं झुकाता), तो क्या यह अक़ीदा में कमी मानी जाएगी? क्या आज मुसलमानों को अक़ीदा सिखाने की आवश्यकता है?
कृपया उन लोगों के लिए कुछ मार्गदर्शन दें जो सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के तरीक़े के अनुसार सही अक़ीदा सीखना चाहते हैं।
उत्तर का सारांश
उत्तर का पाठ
अंतर्वस्तु
इस्लामी अक़ीदा एक व्यावहारिक पद्धति है
इस्लामी अक़ीदा कोई सैद्धांतिक और दार्शनिक पद्धित नहीं है; बल्कि एक गंभीर व्यावहारिक पद्धति है। कर्म इस अक़ीदा का एक मूलभूत आधार है। इसलिए अहले सुन्नत इस बात पर एकमत हैं कि ईमान में कथनी और करनी, यानी ज़बान से बोलना, दिल से ईमान लाना और शारीरिक अंगों से उसपर अमल करना शामिल है।
अतः जो अल्लाह को अपना रब और पूज्य मानता है, वह उसकी इबादत करेगा तथा नमाज़ और ज़कात आदि की अदायगी करके उसकी आज्ञा का पालन करेगा। जो आख़िरत के दिन और उसके हिसाब और प्रतिफल पर ईमान रखता है, वह अल्लाह के आदेशों का पालन करेगा और उसकी निषेध की गई चीज़ों से बचेगा। जो कोई यह ईमान रखता है कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, वह उनकी आज्ञा का पालन करने, उनकी सुन्नत पर अमल करने और उनके धर्म का प्रसार करने के लिए प्रेरित होगा।
इस प्रकार, एक व्यक्ति जिन सिद्धांतों पर ईमान रखता है, वे कर्मों और शब्दों, प्रयास और परिश्रम में परिवर्तित हो जाते हैं। तथा हृदय में जितना अधिक विश्वास बढ़ता है, अंगों पर उसका प्रभाव उतना ही अधिक होता है।
इसलिए नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : "सावधान! शरीर में एक लोथड़ा (टुकड़ा) है, अगर वह सही हो जाए तो पूरा शरीर सही हो जाता है, और अगर वह बिगड़ जाए तो पूरा शरीर बिगड़ जाता है — जान लो, वह दिल है।” इसे बुखारी (हदीस संख्या : 52) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1599) ने रिवायत किया है।
हसन बसरी रहिमहुल्लाह ने कहा : "ईमान कामना करने या शोभा करने से नहीं होता, बल्कि (ईमान) वह है जो दिल में बस जाए और अमल उसकी पुष्टि करे।"
शैखुल इस्सलाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह ने फरमाया : “यदि हृदय उसमें पाए जाने वाले ईमान, ज्ञान और आंतरिक क्रिया के साथ स्वस्थ है, तो अनिवार्य रूप से शारीर भी बाहरी कथन औऱ पूर्ण ईमान पर अमल के साथ स्वस्थ होगा। जैसा कि हदीस के प्रमुख विद्वानों ने कहा है : ईमान कथन और कर्म का नाम है; आंतरिक और बाह्य कथन, तथा आंतरिक और बाह्य कर्म। तथा बाह्य आंतरिक के अधीन और उसके लिए आवश्यक होता है। जब आंतरिक स्वस्थ होगा, तो बाह्य भी स्वस्थ होगा, और जब वह भ्रष्ट होगा, तो बाह्य भी भ्रष्ट होगा। यही कराण है कि सहाबा में से एक व्यक्ति ने लापरवाही से नमाज़ पढ़ने वाले के बारे में कहा : यदि इस व्यक्ति का हृदय विनम्र और एकाग्र होता, तो उसके शारीरिक अंग भी विनम्र और एकाग्र होते।” (मजमूउल-फतावा, 7/187)
अक़ीदा के विषय में उपयोगी पुस्तकें
जहाँ तक अक़ीदा से संबंधित पुस्तकों की बात है, तो वे बहुत-सारी हैं, जिनमें से सबसे प्रमुख हैं अल्लाह तआला की किताब और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत, जिनमें उन लोगों के लिए सुरक्षा और मुक्ति है जो उनका पूरी तरह से पालन करते हैं। विद्वानों ने सही अक़ीदा की व्याख्या और उसका प्रसार करने पर विशेष ध्यान दिया और उन्होंने इस विषय पर अनगिनत किताबें लिखीं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध पुस्तकें निम्नलिखित हैं :
- अस-सुन्नह, द्वारा : अब्दुल्लाह बिन अहमद बिन हंबल।
- अत-तौहीद, द्वारा : इब्ने खुज़ैमह।
- शर्ह उसूल अल-एतिक़ाद अहलिस-सुन्नह, द्वारा : अल-लालकाई।
- अक़ीदतुस-सलफ़ व असहाबिल-हदीस, द्वारा : अस-साबूनी।
- अल-अक़ीदा अल-वास्तिय्या, द्वारा : इब्ने तैमिय्यह।
- अल-अकीदा अत-तहाविय्या और उसकी शर्ह, द्वारा : इब्ने अबिल-इज़ अल-हनफ़ी।
- लवामिउल-अनवार अल-बहिय्या, द्वारा : अस-सफ़्फ़ारीनी।
- मआरिज अल-कुबूल, द्वारा : हाफ़िज़ हिकमी।
- अल-इरशाद इला सहीहिल-एतिक़ाद, द्वारा : शैख सालेह अल-फ़ौज़ान। यह एक सरल, सरलीकृत और लाभकारी पुस्तक है।
सही अक़ीदा सीखना :
जहाँ तक इस अक़ीदा को असल ज़िंदगी में लागू करने का संबंध है, तो यह इसे सीखकर, इसका प्रचार करके, दूसरों को इसकी ओर आह्वान करके और इसका विरोध करने वालों को बुद्धिमता और सुंदर उपदेश के साथ जवाब देने से होगा। इसी तरह अक़ीदा फैलता है, इसके प्रभाव प्रकट होते हैं और लोग इसकी छाया का आनंद लेते हैं।
रही बात सही अक़ीदा सीखने के तरीक़ों की, तो सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे सीधे इसके विद्वानों से सीखा जाए जो इसके बारे में जानकार हैं और इसके अनुसार कार्य करने वाले हैं। जो लोग ऐसा करने में सक्षम हैं, उनके लिए यह सबसे सुरक्षित और सबसे लाभदायक तरीक़ा है। परंतु जो लोग विद्वानों से दूर हैं, उन्हें उनकी व्याख्यायों, पुस्तकों और रिकार्डेड टेपों का सहारा लेना चाहिए, और जो कुछ भी उन्हें अस्पष्ट और कठिन लगे या समझ में न आए, तो उसके बारे में पूछना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति इस्लाम की कुछ शिक्षाओं का पालन करता है और कुछ की उपेक्षा करता है, जैसे कि कुछ अनिवार्य कर्तव्यों को त्याग कर देता है या कुछ निषिद्ध कार्यों को करता है, तो यह उसके ईमान में कमी और उसके विश्वास तथा अपने रब और धर्म के प्रति उसके प्रेम में कमज़ोरी को दर्शाता है। यह निःसंदेह उसके अक़ीदे में एक दोष है।
इसीलिए, अहले सुन्नत वल-जमाअत के मूल सिद्धांतों में से एक यह है कि ईमान आज्ञाकारिता से बढ़ता है और अवज्ञा से घटता है। यह कमी और दोष ईमान को पूरी तरह से खत्म कर सकता है, जिससे व्यक्ति इस्लाम से मुर्तद्द (धर्मत्यागी) हो जाता है, जैसा कि नमाज़ छोड़ने के मामले में होता है। प्रश्न संख्या : (5208) और (2182) देखें।
जहाँ तक उन पापों का संबंध है जो कुफ़्र के स्तर तक नहीं पहुँचते, जैसे कि अनिवार्य ज़कात न देना या निषिद्ध चीज़ों को देखना आदि, तो ये चीज़ें ईमान को कम करती हैं।
मुसलमानों को ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो उन्हें नेक सलफ़ की समझ के अनुसार क़ुरआन और सुन्नत पर आधारित शुद्ध और सही अक़ीदा समझाएँ। क्योंकि अज्ञानता, बिदअतों, मिथकों और विकृत बौद्धिक विचारधाराओं का व्यापक प्रचलन है।
अतः प्रत्येक मुसलमान का यह कर्तव्य है कि वह पहले स्वयं की शुभचिंता करते हुए सही अक़ीदा सीखे और उसे उसके विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त करे, फिर पाठों, व्याख्यानों, पुस्तकों, प्रकाशनों और पत्रिकाओं के माध्यम से उसका प्रसार करे और लोगों को सिखाए। इस प्रकार वह संदेश पहुँचाने और स्पष्ट करने का कर्तव्य पूरा करने वाला होगा, जैसा कि अल्लाह का फ़रमान है :
وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ لَتُبَيِّنُنَّهُ لِلنَّاسِ وَلا تَكْتُمُونَهُ
[آل عمران: 187].
“तथा (ऐ नबी! याद करो) जब अल्लाह ने किताब वालों से पक्का वचन लिया था कि तुम अवश्य इसे लोगों के सामने बयान करते रहोगे और इसे छुपाओगे नहीं।” [सूरत आल-इमरान 3:187]
तथा अल्लाह ने फरमाया :
وَلْتَكُنْ مِنْكُمْ أُمَّةٌ يَدْعُونَ إِلَى الْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَأُولَئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
[آل عمران: 104].
“तथा तुममें एक समूह ऐसा होना चाहिए, जो भलाई की ओर बुलाए, अच्छे कामों का आदेश दे और बुरे कामों से रोके और वही सफलता प्राप्त करने वाले लोग हैं।” [सूरत आल इमरान 3:104]
तथा फरमाया :
قُلْ هَذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ عَلَى بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ
[يوسف: 108].
“(ऐ नबी!) आप कह दें : यही मेरा रास्ता है। मैं और मेरा अनुसरण करने वाले पूर्ण अंतर्दृष्टि तथा स्पष्ट प्रमाण के साथ अल्लाह की ओर बुलाते हैं। तथा अल्लाह पवित्र है और मैं मुश्रिकों (बहुदेववादियों) में से नहीं हूँ।” [यूसुफ 12:108]
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
स्रोत:
साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर