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भूख या प्यास के कारण रोज़ा तोड़ने का क्या हुक्म है?

13-05-2019

प्रश्न 274712

मैं मग़रिब की नमाज़ से पहले सो गया और रोज़ा इफ्तार नहीं किया। फिर मैं फ़ज्र की नमाज़ के समय उठा और मैंने पिछले दिन से खाना नहीं खाया था, इसलिए मैंने रोज़ा तोड़ दिया। तो क्या ऐसा करना जायज़ है?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

रोज़ा इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है, जैसा कि यह सर्वज्ञात है।

इसलिए मुसलमान के लिए जायज़ नहीं है कि वह मात्र प्यास या भूख की वजह से, या मात्र इस डर से कि वह रोज़ा रखने में सक्षम नहीं है, इसके बारे में लापरवाही से काम ले। बल्कि उसे धैर्य से काम लेना चाहिए और अल्लाह सर्वशक्तिमान से मदद मांगना चाहिए। तथा ठंडक प्राप्त करने के लिए उसके लिए अपने सिर पर पानी डालने और कुल्ली करने में कोई आपत्ति की बात नहीं है।

अतः उसे चाहिए कि वह अपने दिन की शुरूआत रोज़ा रखते हुए करे। फिर यदि ऐसा होता है कि वह उसे पूरा करने में सक्षम नहीं है, और उसे डर है कि वह मर सकता है या बीमार हो सकता हैः तो ऐसी स्थिति में उसके लिए रोज़ा तोड़ना जायज़ है। लेकिन वह मात्र भ्रम के आधार पर रोज़ा नहीं तोड़ेगा, बल्कि वह कठिनाई का अनुभव करने के बाद ही रोज़ा तोड़ेगा।

इब्ने क़ुदामा कहते हैं :

“सही दृष्टिकोण यह है किः अगर उसे अत्यधिक प्यास या भूख आदि के कारण अपनी जान का डर हैः तो वह रोज़ा तोड़ सकता है।”

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने अल-काफ़ी पर अपनी टिप्पणी में फरमाया :

“अगर उसे प्यास का डर है, लेकिन इससे अभिप्राय मात्र प्यास (साधारण प्यास) नहीं है; बल्कि इससे अभिप्राय वह प्यास है जिससे मरने का डर है, या नुक़सान का डर है।”

“तालीक़ात इब्न उसैमीन अलल-काफ़ी” (3/124) से उद्धरण समाप्त हुआ।

इमाम नववी रहिमहुल्लाह “अल-मज्मूअ” (6/258) में कहते हैं : “हमारे साथियों और अन्य लोगों ने कहा: जो भी भूख और प्यास से अभिभूत हो जाए और उसे मरने का डर होः तो उसके लिए रोज़ा तोड़ना अनिवार्य है, भले ही वह स्वस्थ और निवासी हो। क्योंकि अल्लाह का कथन है :

 ولا تقتلوا أنفسكم إن الله كان بكم رحيما

سورة النساء: 29 

''और तुम अपनी जानों को न मारो, निश्चित रूप से अल्लाह तुम पर दयालु है।'' (सूरतुन्निसा: 29)

तथा अल्लाह तआला का यह कथन है:

 ولا تلقوا بأيديكم إلى التهلكة 

سورة البقرة: 195 

"अपने आप को विनाश न करो।" (सूरतुल बक़रा : 195)

और उसके लिए बीमार व्यक्ति की तरह क़ज़ा करना अनिवार्य है। और अल्लाह ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

अतः आप के लिए उस दिन की क़ज़ा करना अनिवार्य है, और अगर आप ने जल्दबाजी करते हुए उस कठिनाई का अनुभव करने से पहले ही रोज़ा तोड़ दिया था जिसकी वजह से आपके लिए रोज़ा तोड़ना जायज़ हो जाता है, तो जो कुछ आप ने किया है उससे आपके लिए तौबा (पश्चाताप) करना अनिवार्य है, और आपको फिर कभी ऐसा नहीं करना चाहिए।

तथा प्रश्न संख्याः (65803) और (37943) का उत्तर देखें।

और अल्लाह ही सबसे अच्छा ज्ञान रखता है।

उज़्र वालों के रोज़े
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