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क्या वह ब्याज पर आधारित बैंक की नीलामी से एक कार खरीद सकता है, जिसका मालिक अपनी बकाया राशि का भुगतान करने में विफल रहता है?

22-10-2022

प्रश्न 178394

क्या ब्याज पर आधारित बैंक द्वारा आयोजित नीलामी से कार खरीदना जायज़ हैॽ दरअसल, होता यह है कि ये बैंक कुछ कारों को वापस ले लेते हैं, जिनके मालिक अपनी क़िस्तों (इंस्टालमेंट्स) का भुगतान करने में विफल रहते हैं। इसलिए वे उस कार को कुछ समय के लिए रखते हैं, इस उम्मीद में कि उसका मालिक अपने अवसाद से उठेगा और अपनी क़िस्तों का भुगतान करके अपनी गाड़ी वापिस ले जाएगा। अगर वह ऐसा नहीं करता है, तो वे उसे नीलाम करके बेच देते हैं। तो इस नीलामी से कार खरीदने के बारे में इस्लामी शरीयत का हुक्म क्या हैॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

ब्याज पर आधारित बैंक द्वारा आयोजित नीलामी से कार खरीदना दो शर्तों के साथ जायज़ है :

पहली शर्त : यह कि कार के मालिक ने बैंक को इसे बेचने की अनुमति दी हो, या अदालत ने इसका फैसला सुनाया हो; क्योंकि बैंक के लिए गिरवी रखी हुई कार को ग्राहक की अनुमति के बिना बेचना जायज़ नहीं है, सिवाय इसके कि अदालत ने इसका फैसला सुनाया हो।

उन्होंने “ज़ाद अल-मुस्तक़्ने” में कहा : “जब क़र्ज चुकाने का समय आ जाए और वह (उधारकर्ता) इसे चुकाने से इनकार कर दे, तो अगर राहिन (गिरवी रखने वाले) ने गिरवी-दार (रेहनदार : वह व्यक्ति जिसके पास कोई चीज़ गिरवी रखी जाए) को उसे बेचने की अनुमति दी है, तो वह उसे बेच देगा और क़र्ज चुकाएगा। अन्यथा शासक उसे क़र्ज़ चुकाने या उस वस्तु को बेचने के लिए मजबूर करेगा, जो गिरवी रखी गई है। यदि वह ऐसा नहीं करता है, तो शासक उसे बेच देगा और उसके कर्ज का भुगतान करेगा।” उद्धरण समाप्त हुआ।

दूसरी शर्त : यह है कि उस कार को बाजार मूल्य पर नीलामी में पेश किया जाए, उसी तरह जैसे कि इसी तरह की इस्तेमाल की गई कारों को पेश किया जाता है; क्योंकि उसे उसके मालिक की ओर से उसके क़र्ज़ का भुगतान करने के लिए बेचा जा रहा है। अत: उसे उसकी क़ीमत से कम में बेचना या उसकी संपत्ति में से कोई चीज़ उसकी सहमति के बिना लेना जायज़ नहीं है।  

उन्होंने "मुग़्नी अल-मुहताज" (3/71) में कहा : “निष्पक्ष व्यक्ति गिरवी रखी गई संपत्ति को, एक वकील (एजेंट) की तरह, अपने देश की नकदी (स्थानीय मुद्रा) से वर्तमान समय की समान कीमत में ही बेचेगा। यदि वह इनमें से किसी भी चीज़ का उल्लंघन करता है, तो यह बिक्री (लेनदेन) वैध नहीं है। लेकिन समान कीमत में इतनी कमी करने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है जिसकी लोग उपेक्षा परते हैं। क्योंकि वे आमतौर पर इतनी छोटी राशि की अनदेखी करते हैं।” उद्धरण समाप्त हुआ।

‘निष्पक्ष व्यक्ति’ वह है जिसके पास रेहन (संरक्षण के लिए) रखी जाती है, जब दोनों पक्ष रेहन की राशि को किसी के पास संरक्षण के लिए रखने के लिए सहमत होते हैं।

अगर दोनों शर्तें पूरी होती हैं, तो इसे खरीदने में कोई बुराई नहीं है।

तथा बेचने के लिए मजबूर इस व्यक्ति से खरीदना नापसंदीदा नहीं है।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने उस व्यक्ति के बारे में, जो अपने बकाया का भुगतान करने के लिए बेचने पर मजबूर किया गया है, कहा :

“क्या उससे खरीदना मकरूह (नापसंदीदा) हैॽ फुक़हा – रहिमहुमुल्लाह - कहते हैं : उससे खरीदना मकरूह है; क्योंकि वह मजबूरी में बेच रहा है। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मजबूर व्यक्ति को बेचने से मना किया है। जबकि यह आदमी बेचने के लिए मजबूर है। लेकिन सही राय यह है कि यह मकरूह नहीं है; क्योंकि अगर हम कहते हैं कि यह मकरूह है, तो यह उसकी सज़ा को बढ़ाने का कारण बनेगा। अगर हम लोगों से कहें : उससे मत खरीदो, जबकि ये (उधारदाता) लोग उसे सुबह और शाम मारते-पीटते हैं कि वह उन्हें पचास औंस चाँदी भुगतान करे, तो उसपर ज़बरदस्ती (जब्र करने) का दण्ड सदा बना रहेगा। अतः सही राय यह है कि उससे खरीदना मकरूह नहीं है। बल्कि अगर यह कहा जाए कि उससे खरीदना मुस्तहब है; ताकि उसे इस पीड़ा से मुक्त किया जा सके, तो इसका एक औचित्य होगा। जहाँ तक मजबूर व्यक्ति की बिक्री के निषेध का सवाल है (जैसा कि ऊपर वर्णित हदीस में है), तो इसका मतलब यह है कि एक व्यक्ति किसी ऐसी चीज़ के लिए मजबूर है जो आपपर उसे देना अनिवार्य है, फिर आप उसे वह चीज़ बिना बिक्री के न दें। (तो इससे मना किया गया है)। इस तरह उक्त वाक्य का मतलब है : “मजबूर व्यक्ति को बेचना मना है”, उसका मतलब यह नहीं है कि : “मजबूर व्यक्ति का बेचना मना है।”

“अश-शर्ह अल-मुम्ते” (15/488) से उद्धरण समाप्त हुआ।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है। 

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